प्रेमचंद नहीं हैं फिर भी प्रेमचंद हैं
चित्रा मुद्गल ने कहा कि मुझे लगता है कि प्रेमचंद के बाद 30-40 सालों तक उनका प्रभाव साहित्य पर रहा. मुझे लगता है कि बंगाल के नवजागरण का प्रभाव केवल भारतेंदु पर नहीं हुआ था. प्रेमचंद ने सृजनात्मकता को एक एक्टिविज्म में बदलने की कोशिश की. अपनी रचनाओं में उन्होंने भारतीय समाज में दबी रुढ़ियों, पाखंड जैसी तमाम विषयों को चुना. इन सब विषयों को उन्होंने सृजनात्मकता के माध्यम से लोगों के सामने रखा. लोगों में ये बातें उतर गईं और उन्हें लगा कि ये तो हमारी बात है. गोदान के बाद उनका जीवन बहुत कम बचा. लेकिन हम पाते हैं कि 40 वर्षों तक प्रेमचंद हिंदी साहित्य को दिशा देते रहे. इसी के साथ उन्होंने प्रेमचंद की तीन कहानियों का उदाहरण देकर यह भी बताया कि प्रेमचंद की कहानियां आज भी हमें संदेश देते हैं. अंत में उन्होंने कहा कि प्रेमचंद नहीं हैं फिर भी प्रेमचंद हैं.