नव निर्माण की कोशिश

सृष्टि नवनिर्माण में लगी हुई है ....


नदियों का जल स्वच्छ हो रहा है ...नए नए पक्षी कलरव कर रहे हैं ...आज मनुष्य पिजंरों में है ..वे स्वच्छ विचरण कर रहे हैं ...


संसार की आबो-हवा इतनी साफ है कि खूब खुल कर हम साँस ले रहे हैं ...भागती जिन्दगी ने विश्राम लिया है ..परिवार , हँसी के ठहाके घरों में लौट आए हैं ....


हाँ , कीमत भी भारी चुका रहे हैं मगर हम वह सब पा रहे हैं जो हमने उसे दिया ! हमने प्रकृति का भरपूर दोहन किया मानव को बनाने की कोशिश में हम दानव बन गए फिर कुदरत का डंडा पड़ा और समझ में आया 


आइए , प्रकृति को अंगीकार करें ! हम भी अपने आप को मानसिक , शरीरिक रूप से स्वस्थ करें !!